जब भी अंतरिक्ष के बारे में बात होती है तब भारत के लोगों के मन में एक ही नाम आता है और वह है ISRO(Indian Space Research Organisation)।
इसरो भारत का एक ऐसा संगठन है जिसने दुनिया को दिखाया है कि हिम्मत और जज्बा हो तो कोई भी मिशन या काम नामुमकिन नहीं होता।
आज हम आपको इसरो के तीन सबसे सफल मिशनों के बारे में जानकारी देंगे – मंगलयान (Mangalyaan), PSLV और चंद्रयान (Chandrayaan)।

चंद्रयान मिशन: चाँद तक भारत की उड़ान
चंद्रयान-1 (2008)
यह भारत का सबसे पहला चंद्रयान मिशन था जिसे 22 अक्टूबर 2008 को लॉन्च किया गया था। इस मिशन का मुख्य उद्देश्य चंद्रमा की सतह पर पानी की मौजूदगी का पता लगाना और परीक्षण करना था।
इसरो ने इसे PSLV-C11 रॉकेट के जरिए लॉन्च किया था और इस मिशन से इतनी सफलता मिली कि इसरो के इस माहिती का उपयोग अमेरिका की रिसर्च संस्थान नासा ने किया था।
खास बात यह थी कि चंद्रमा की सतह पर पानी के संकेत खोजने वाला भारत पहला देश था।
चंद्रयान-2 (2019)
इसरो ने चंद्रयान 2 को लॉन्च करके दूसरा इतिहास रचने की कोशिश की जिसमें चंद्रमा के सबसे मुश्किल जगह दक्षिणी ध्रुव पर लैंडिंग की।
हालांकि इसमें लैंडिंग के कुछ समय पहले ही संपर्क टूट जाने के कारण मिशन पूरी तरह सफल नहीं हो पाया, लेकिन इसमें लगा ओर्बिटर अभी भी काम कर रहा है बहुत सारे कीमती डाटा भेज रहा है।
चंद्रयान-3 (2023)
यह भारत के अंतरिक्ष इतिहास का सबसे सफल चंद्रयान मिशन था। इस चंद्रयान-3 के लैंडर विक्रम ने चंद्रमा के दक्षिण ध्रुव पर सफलतापूर्वक लैंडिंग की और रोवर ने चंद्रमा की सतह पर चलकर कई सारा डाटा इकट्ठा किया।
इसके साथ ही चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर पहुंचने वाला भारत विश्व का सबसे पहला देश बन गया।
यह इसरो का सबसे भरोसेमंद और सुरक्षित उपग्रह लॉन्च व्हीकल है। इसे हम इसरो का इंजन भी कहां सकते हैं क्योंकि यह अब तक 50 से ज्यादा उपग्रह को सफलतापूर्वक लॉन्च कर चुका है।
PSLV: भारत का भरोसेमंद रॉकेट
PSLV एक चार स्टेज वाला लॉन्च व्हीकल है, जिसे मुख्य रूप से सैटेलाइट को भेजने के लिए डिजाइन किया गया था। लेकिन अभी समय के साथ ही इसकी क्षमता और टेक्नोलॉजी को इतना ज्यादा एडवांस किया गया है कि अब यह व्हीकल चंद्र से लेकर सूर्य तक सभी मिशन में उपयोग होने लगा है।
इसरो ने समय के साथ PSLV को चार वेरिएंट में बनाया है। जो अलग-अलग मिशन के अनुसार उपयोग में लिए जाते हैं।
PSLV की कुछ खासियतें
- PSLV की सफलता का दर 95% से ज्यादा है जो इस दुनिया का सबसे भरोसेमंद लॉन्च व्हीकल में से एक बनता है।
- यह एक ही बार में अलग-अलग कक्षा के अनुसार उपग्रह को लॉन्च करने में सक्षम है।
- इसने 30 से ज्यादा देश के सैटेलाइट को भी सफलतापूर्वक लॉन्च किया है।
- 15 फरवरी 2017 में PSLV के जरिए इसरो ने एक साथ साथ में 104 उपग्रह को अंतरिक्ष में भेजकर विश्व रिकॉर्ड बनाया है।
- आज भी कहीं देश इसरो की मदद से ही अपने सैटेलाइट को लॉन्च करवाते हैं, जो हमारे लिए एक गौरव की बात है।
- इसकी एडवांस तकनीक, ज्यादा सफलता दर और कम लागत के कारण यह भारत का एक प्रमुख लॉन्च व्हीकल बन गया है।
मंगलयान: भारत की मंगल तक की उड़ान
इसरो ने 5 नवंबर 2013 को अंतरिक्ष में एक ऐसा काम करके दिखाया जिसे विकसित देश भी नहीं कर पा रहे थे।
- इसे PSLV रोकेट की मदद से मंगलयान को श्रीहरिकोटा से लॉन्च किया गया था।
- 24 सितंबर 2014 को यह सफलतापूर्वक मंगल ग्रह की कक्षा में पहुंच गया था।
- इसके साथ ही इसरो एशिया का पहला अंतरिक्ष संगठन बना जिसने पहले ही कोशिश में मंगल ग्रह तक पहुंच बनाली।
- इसकी लागत सिर्फ 450 करोड रुपए आई थी, जो किसी भी अंतरिक्ष मिशन के मुकाबले काफी कम थी।
मंगलयान पूरी तरह से भारत में डिजाइन और विकसित किया गया था। इसमें इस्तेमाल किए गए सभी सॉफ्टवेयर, यंत्र और तकनीक सभी भारतीय थे।
मंगलयान करीब 8 साल तक मंगल ग्रह की परिक्रमा करता रहा। इसकी खास बात यह थी कि इस मिशन की योजना सिर्फ 6 महीने की थी। इसे दुनिया भर में इसरो का सबसे सफल और महत्वपूर्ण मिशन माना गया है।
इस मंगलयान ने मंगल ग्रह के वातावरण और मौसम से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां भारत को भेजी। इसके कारण ही भविष्य के मिशनों में बहुत ज्यादा मदद मिलेगी।
निष्कर्ष
इन सभी मिशनों ने न केवल भारत को वैश्विक स्थल पर सम्मान दिलाया, बल्कि और भारतीय को महसूस कराया की हम भी किसी से पीछे नहीं है।
कम बजट, भारतीय तकनीक और आत्मनिर्भरता के साथ इसरो ने जो काम किए हैं वह किसी भी चमत्कार से काम नहीं है।
इसरो आज भी सिर्फ एक संस्था नहीं है बल्कि यहां भारत की एक पहचान बन चुका है। आने वाले समय में इसरो और भी नए मिशनों के साथ भारत को और भी आधुनिक बनाएगा।
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